क्रांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष और राज्यसभा की सदस्य सोनिया गांधी ने एक लेख में केन्द्र सरकार की उसकी शिक्षा नीति को लेकर जमकर घेराबन्दी की है। उनका आरोप है कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार बिना पर्याप्त विचार-विमर्श के और अपने राजनीतिक उद्देश्यों को पूरा करने के मकसद से राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 जनता पर थोप रही है। अंग्रेजी अखबार द हिंदू में प्रकाशित होने के बाद जमकर चर्चा में आये इस लेख में सोनिया गांधी ने इस बात की आलोचना की है कि भाजपा सरकार ने 'सी 3' (केंद्रीकरण- सेंट्रलाइज़ेशन, व्यावसायीकरण- कमर्शिलाइज़ेशन और सांप्रदायिकता- कम्युनलिज़्म़) के अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने का साधन नई शिक्षा नीति (एनईपी) को बनाया है। इस लेख में वैसे तो कांग्रेस नेत्री ने अनेक महत्वपूर्ण मुद्दे उठाये हैं परन्तु इसका मुख्य फोकस शिक्षा प्रणाली के वे आयाम हैं जो देश के लिये विनाशकारी साबित होंगे। उन्होंने एनईपी में अनेक खामियां गिनाते हुए कहा कि यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारों को पूरा करने के लिये बनाई गई है।
शिक्षा किसी भी समाज के विकास की बुनियाद होती है। सोनियाजी के इस लेख में एनईपी से उत्पन्न होने वाले खतरे तथा उनकी चिंताएं साफ झलकती हैं जो इस बात का भी आभास कराती हैं कि इस शिक्षा प्रणाली की राह पर चलकर बनने वाला समाज व देश कैसा होगा। इस लेख में सरकार की शिक्षा के प्रति बरती जाने वाली उदासीनता तथा नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में पिछले 11 वर्षों से चल रही सरकार की सायास फैलाई जा रही बदइंतज़ामी के चलते बड़ी तादाद में बन्द होते स्कूल, सरकार के विचारों का समर्थन न करने वाले शिक्षाविदों तथा शिक्षकों के साथ होता भेदभावपूर्ण व्यवहार आदि की ओर तो ध्यान दिलाया ही गया है, सोनिया गांधी ने विस्तार से स्पष्ट किया है कि ' 3 सी' का एजेंडा मोदी सरकार किस प्रकार से लागू कर रही है और उसके दुष्परिणाम क्या हो रहे हैं। यही एक तरह से उनकी शिक्षा व्यवस्था की समीक्षा का निष्कर्ष है जो हर उस नागरिक को परेशान करने के लिये काफी होना चाहिये जो मुल्क की बेहतरी की सोचता हो। नई शिक्षा प्रणाली के नाम पर बच्चों को जिस प्रकार से ढाला जायेगा और उनके जो हालात होंगे, उसकी ओर साफ इशारा सोनिया गांधी के लेख में है।
मुख्यत: जिस '3 सी' का उन्होंने अपने लेख में ज़िक्र किया है, उसके पहले 'सी' यानी केन्द्रीकरण के बारे में बात की जाये तो यह तो साफ है कि यह सरकार समाज के हर संसाधन व अवसरों पर एकाधिकार कर रही है। इनमें शिक्षा व्यवस्था भी है। लेख में कहा गया है कि वैसे तो शिक्षा समवर्ती सूची में शामिल है, यानी वह केन्द्र व राज्य दोनों का ही विषय है, लेकिन इस महत्वपूर्ण मसले पर केन्द्र सरकार न तो राज्यों से चर्चा करती है और न ही वह विशेषज्ञों से सलाह-मशविरा लेती है। वह इस मामले में अपनी मर्जी तो थोपती है बल्कि उसका रवैया 'धमकी भरा' भी होता है। उन्होंने इस मामले में तमिलनाडु के साथ केन्द्र द्वारा राज्यों पर हिन्दी को थोपने की कोशिशों की ओर भी ध्यान दिलाया है।
दूसरे 'सी' यानी व्यवसायीकरण की बात करें तो यह पहले ही साफ दिख रहा है कि मोदी सरकार शिक्षा को इतनी महंगी कर देने पर आमादा है कि वह सामान्य लोगों की पहुंच से बाहर हो जाये। इसके कारण देश में वर्गभेद और भी बढ़ेगा। थोड़े से लोग ही इस शिक्षा को पाने का खर्च वहन कर सकेंगे जबकि अधिसंख्य जनता स्कूल-कॉलेजों का खर्च वहन नहीं कर सकेगी। शासकीय व सस्ती शिक्षा की बजाय निजी व महंगी शिक्षा के प्रति सरकार का रुझान साफ दिखाई देता है। सोनिया गांधी द्वारा उल्लेखित तीसरा 'सी' इस फार्मूले का सबसे खतरनाक पक्ष है- शिक्षा का साम्प्रदायिकरण। इस शिक्षा पद्धति में आधुनिकता का अभाव है। उन्होंने ध्यान दिलाया है कि पाठ्यक्रम से महात्मा गांधी और मुगलकालीन इतिहास को हटाया जा रहा है जो कि बहुत गम्भीर है। इतिहास में हुई घटनाएं किसी को पसंद आयें या न आयें, वे हो चुकी हैं; लेकिन भाजपा अपनी सरकार के जरिये उन्हें इसलिये मिटाना चाहती है ताकि उसका हिंदुत्व का एजेंडा पूरा हो। यह बच्चों में आधुनिक, तटस्थ व वैज्ञानिक पद्धति पर आधारित शिक्षा की जगह पर पिछड़ी सोच तथा पूर्वाग्रहों वाली प्रणाली लागू करने का प्रयास है। इसका मकसद अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफ़रत तथा हिंसा को बढ़ावा देना है जो कि भाजपा का अगले कई वर्षों तक का वोट बैंक बनायेगा। राजनीतिक स्तर पर किया गया धु्रवीकरण, जिसके बल पर भाजपा ने सत्ता हासिल की है- उसे बनाये रखना भी इसी प्रणाली के जरिये होगा।
दरअसल भाजपा सरकार देश को उसी मध्य युग में ले जाना चाहती है जहां समाज का आधार मनुवादी व्यवस्था हो। इसमें शिक्षा उन थोड़े से लोगों के लिये उपलब्ध होगी जो विशेषाधिकार प्राप्त हों। देश की बहुसंख्य आबादी निरक्षर या अल्प शिक्षित रहे जिसे अपने अधिकारों के प्रति न तो जानकारी हो, न ही वह अपने विकास की बात करे। संघ का पूंजीवाद में विश्वास है। कुछ लोगों के हाथों में सारी आर्थिक ताकत सिमट जाने पर उनके लिये सस्ता मानव श्रम जुटाने की जिम्मेदारी इसी शिक्षा प्रणाली की होगी। इतना ही नहीं, इसी शिक्षा प्रणाली में ऐसे नागरिकों की पौध तैयार हो रही है जो भाजपा के निर्देश पर समाज में हिंसा व घृणा फैलाने का काम अगले कई बरसों तक करती रहेगी। इसलिये इसका विरोध ज़रूरी है। सोनियाजी ने बहुत महत्वपूर्ण विषय पर नागरिकों का ध्यान आकृष्ट किया है। हठधर्मिता छोड़कर सरकार इस ओर ध्यान दे।